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यद्यपि सिद्धान्तबिन्दु के संस्करृेतमय कर सैस्कारण निकर चुके है, संस्कृत के विद्वानों को वेदान्त के उन सुगूढ विचारो का, जिनका कि इस स्वल्पकाय पर प्रमेयप्रचुर म्रन्थ बड़ी हृदयङ्घमता के साथ समवे किया गया है, मनन करने एवं आस्वाद-लेने का पर्या्त सौभाग्य मिला है वे अद्वैतवाद कै अन्यतम परिपोषक एवं साथ ही भक्ति-भाव से आकण्ठपरिपूर्णं भाचायं॑मधुसूदन सरखती की बुद्धि की चमक्करति, पाण्डित्य की गरिमा, विचारशीर्ता की पराकाष्ठा, कल्पना-राक्ति की अतुरूता, हदय की उदारता आदि गुणश्रेणि से पूर्णतया परिचित किन्तु जो संस्कत नहीं जानते, वे भी राष्टूमाषा हिन्दी के सरे उनकी सदुक्तियो का मनन कर ॒ज्ञानपिपासाशमनपूर्रक ब्रह्मषुखाखाद कर सके एवं चरम पुरुषार्थं के भागी हो सर्के इस विचार से वेदान्त- तत््वान्वेषियो के सम्मुख इस सालुवाद म्रन्थ को उपस्थित करते हमे परम हर्ष हो रहा है

( सिद्धान्तनिन्दु आचार्थं॑मधुसूदन सरखती की खतन्त्र कृति नहीं है यह आवार्यप्रवर श्रीशङ्कर भगवान्‌ के दशश्छोकी का न्याल्यानमात्र है म) साधारण दस छन्दो भै वेदान्त के जिन दुरूह पदार्थो को उन्होने . भपनी ज्ञानदृषटि से देखा है, वह अवदय विस्मय- जनक एवं उन्हीं-लैसे कती महापण्डितों से साध्य है नहीं कहं सकते कि मगवान्‌ शङ्कराचार्य ने भी इन र्छोकों की सचना के समय इनके इतने सारगभित होने की कल्पना की हो या नदीं सचमुच मधुसूदन सरखती की विद्वत्ता निःसीम थी वे जैसे ज्ञानी ये-वैसे ही कल्पक भी थे इस छोटे-से म्रन्थ मे उन्हनि आत्मा, अनात्मा, ज्ञान, अज्ञान, अध्यास, जीव, ईर, आमासवादः प्रतििम्बवाद, अवच्छेदवादः

( )

दृष्टिस्॒टिवाद आदि फितने ही वेदान्त के सुख्य-सुख्य पदार्थो की, ऊहा- पोदपूरवक हृदयङ्गम व्याख्या की है। आस्तिक एवं नास्तिक समी दार्मनिको के मत मे होनेवाटी आत्मविषयक विप्रतिपत्तिं तथा, अनुपपक्तियों का खण्डन कर अद्धैतवाद के सिद्धान्त की बडे रोचक दग से पुष्टि की गयी है] इसके अतिरिक्त अनेक विषयो मे शङ्कां का समाधान क्रिया गया है मूकभूत तस कितने हैँ £ अनेक प्रकार के व्यापारो से युक्त बाह्य सृष्टि काक्या खरूपहै ? जन्म, स्थिति; मरण के मुर-कारण कौन-कौन हैँ घुख, दुःख, राग, देष आदि रूप आम्यन्तर्‌ सृष्टि का वास्तविक रूप क्या है ? भौर उसके मूक-कारण वौन हैँ इत्यादि प्रश्चो के विवेचन में यह निबन्धं पराकाषए्रा को पद्ैचा है ! प्रथम तथा अष्टम रखोक की व्याख्या मै तो अाचार्थं ने अपूर्व कौरारु दशया है, वेदान्त के सभी पदार्थ निचोड़ कर्‌ रख दिये है |

यह उपर कहा ज! चुका है कि प्रस्तुत पुस्तक वेदान्त-सम्बन्धी है इसल्यि यहो पर इस विषय. मे निवेदन कर देना प्रसङ्गतः प्रा् दै कि वेदान्त किसे कते £ वेदान्त है वेद का सार भाग। वेद तीन भागम विभक्त दै--( १) कर्मकाण्ड, (२) उपासनाकाण्ड एवं (३ ) ज्ञानकाण्ड ज्ञानकाण्ड ही वेद्‌ कासार है गड का दूसरा नाम है उपनिषद्‌ , क्कि उपनिषदों म॒ही आत्मविषयकः ज्ञान की भालोचना एवं विचार क्रिया गया है, अतः सिद्ध इभा कि उपनिषद्‌ भाग का नाम वेदान्त हैः उक्त ज्ञानकाण्ड के तात्प के विषय मे अनेक विरोध होने के कारण उसकी मीमांसा के हेतु त्रह्म- सूत का निर्माण इञा, अतः उसकी भी वेदान्त मे गणना होनी युक्त 2 भगवान्‌ श्रीङृष्ण के श्रीमुख से उदृभूत गीता मे उपनिषदौ का सार ` भरा हआ है, इसख्यि उसको भी वेदान्त कहन ससुचित हीह यपि ` वेदान्तपद्‌ से मुख्यतया -अस्थानन्यी--उपनिषद्‌, ब्रह्मसूत्र. एवं गीता -नह् की एकता का निरूपण करने के

^ ५५

(३

कारण माप्य; टीकार्पु एवं खतन्त्र॒ निबन्ध आदि भी वेदान्तपद्‌- वाच्य हें.

मधुसूदन सर्खती ने अपने जन्म से किंस प्रान्त को अछ्ङकत ` किया, कौन राताब्दी उनके आषिमीब से धन्य इई, उनकी छोकयात्रा केसे सम्पन हुई, उन््ोने कौन-कौन म्रन्थरल्न रचे £ इत्यादि जिज्ञासा की शान्तिके हेतु यदौ पर कुछ वि्रैचन किया जाता है--

हमारे चरितिनायक सस्यद्यामख वङ्ग भूमि के सभुञ्ञ्वर्‌ रत्र उन्हे अपने गर्भ मे धारण कर सचमुच उसका शर्तगमो? नाम सार्थक हो गया वे वद्कवासी थे, इस विषय मे अनेक प्रमाण है वेदान्त- कल्प-कतिका मेँ उन्होने (नीलचच्नाथस्य भजनाक्लननिमंरीकृन- ज्ञानचक्चुः प्रस्यक्षेणाज्ञाननिच्त्तिमन्ुभवति, ओौपनिषदःस्तु नीलाचटनाय- कैनाचुगृहीताः, इत्यादि वाक्यो मेँ नीलाचख्नाथ का समु्ेख कर उनके विषय मे अपनी अतुर भक्ति का परिचिय दिया है नीरचल्नाथ या नीलचर्नायक पद भगवान्‌ जगन्नाथजी के पर्यायवाची है जगन्नाथपश्चक आदि स्तोत्र के 'नीलाद्िचूडामणिम्‌! "नीलाद्रौ शाङ्खमघ्ये रात- दरुकमले रत्तसि्ासनस्थम्‌” "कनकरुचिरे नीरुरिखरे-" `" ' इत्यादि वचन इस विषय मेँ प्रमाण है उस समय सारे बङ्गा मँ भगवान्‌ जगनाथ- जी की मक्तिस्रोतचिनी प्रबरु वेग से बह रही थी उनकी भी खोपास्य- देव के विषय मेँ अतु भक्ति होना खामाविक दही था इससे विदित होता है कि वे वङ्खवासी ये।

मधुसूदन सरखती के रिष्य पुरुषोत्तम सरस्वती ने सिद्धान्तविन्दु के नवह याचनया मयायमल्पो बलमद्रस्य कृते कृतो निबन्धः, इस शोक की व्याख्या करते इए बर्मद्र को मद्वाचार्य बताया है ओर गौड ब्रह्मानन्द ने बलभद्र को आचाय की सेवा मे निरत ब्रह्मचारी कहा ^मह्वचार्य उपापि प्रायः बङ्गदेशे ही प्रचलति है। शिष्य की प्रार्थनामनत्न से एक म्रन्थ तैयार कर देना उसकी अतिशय प्रेममाजनता एवे सेवा निरतता का चोतक है | इस बात का उदाहरण प्रायः वङ्गदेशीय

(४ > विद्वान मे द्यी पाया नाता है सुक्तावल्यीकार पण्डितरिरोमणि श्रीविश्वनाथ पञ्चानन ने भी अपने स्नेहभाजन शिष्य राजीव की प्राथना पर मुक्तावटी की रचना कर संस्कृत-संसार्‌ का बड़ा उपकार कियाद इससे भी सिद्ध होता है किवे बङ्घवासीये। दुक टीकाकारो ने तो मधुसूदन सरस्वती को भी भद्ाचा्य कहा है | जो कुछ मी हो इनके वङ्घवासी होने मे किसी को सन्दे नहीं है |

इनके विषय मेँ वंशबरृक्ष आदि से जो सामग्री उपट्न्ध हई है उससे विदित होता है कि इनके मूर-पुरुष का नाम राम भिश्च यावे समस्त वङ्गदेशीय ब्राह्यणो के मूल-पुरूष एवं वेदनिरत तपसी ब्राह्मण थे | उरम्होनि जिला फरीदपुर के अन्तरगत “कोटख्पाड़ा?. प्राम को अपना निवासस्थान बनाया आचार्यं सघुसूदन के पिता का नाम प्रमोदन पुरन्दर था वे बड़ प्रख्यात व्यक्ति उनके चार पुत्र हए--( ) श्रीनाय चूडामणि, (२ ) यादवानन्द न्यायाचार्य, (२ ) कमलर्जनयन एवं ) वाभीरा गोखवामी उन्म यादवानन्द न्यायाचार्यं॑राजा प्रतापादिल्य की राजसभा के प्रधान पण्डित ये उनके अपू पाण्डित्य से प्रसन्न होकर राजा ने उन अविरम्न स्रखती की उपाधि दी थी | उनके जयेष्ठ एवं कनिष्ठ पुत्र के ष्रिषय मेँ कोई विदोष उद्ेखयोग्य वातं ज्ञात हो सकी तृतीय पुत्र कमर्जनयन ही हमारे चरितनायक है उन्होने बाल्यावस्था में नवद्ीप न्याय का अध्ययन किया था | उनके न्यायद्चाच्न के गुरु हरीराप तक्वागीश् ये न्याय के अमाध विद्वान्‌ गदाधर म्वचार्य उनके सहाघ्यायी ये ! उनकी खुद्धि बड़ी प्रखर थी ` न्याय के साथ-ही-साथ माधव सरस्वती के निकट उन्न वेदान्त आदि दनो मेँ भी अतिद्य ओढता प्राप्त कर खी थी ` इस प्रकार नवद्धीप में अध्ययन क्र मधुसूदन सरस्वती काशी ` पघारे अभी उनका विवाह नदीं हआ था, वे आवार ब्रह्मचारी ये ¦ किंवदन्ती है किं काशीवासी पण्डितगण उनके साथ विचार मे-उनकी ~ अलोकं प्रतिमा के सामने नही ठहर सके ! कारी मे पडले-पहल

५-*

( )

उन्होने दण्डी स्वामी विचेशवर सरस्वती के चतुःषष्टियाटसित मठ मे निवास किया था जब विश्वेश्वर सरस्वतीः ने मघुसूदनजी की भसाधारण प्रतिमा की चचौ सुनी, तो उन अपने समीप बुखाया, मधुसूदन सरस्वती उनके निकट उपस्थित हए राखरचर्चा मे अपनी नवन- वोन्मेषराङिनी म्रज्ञा से उन्होने विश्ेश्वर सरस्वती को विगुग्ध कर दिया] वह्यं विश्वेश्वर सरस्वती के निकट संन्यास की दीक्षालेखी। कह नहीं सकते कि उनके संन्यास छने विशचेश्धर सरस्वती का उपदेदा कारण हो, अथवा विपक्षियों के आक्रमण से जर्जरिति अद्वैतवाद के उद्धार के सिय बद्धपरिकर होनेके कारण स्वथ ही उन्होने प्रथमाश्रम से चतुथाश्रम ग्रहण किया हो| जोमी हो, मधुसूदन सरस््रतीजी ने अजन्म अदैतवादकी जो सेवा की वह असाधारण एवं स्तुत्य है उन्होने सदा के च्ि अद्धैतवादधैजयन्ती को देदीप्यमान कर दिया एवं गगनमण्डर सचसे ऊँचे फहरा दिया कती आचा ने अपने इस कृत्य से अपनी कीरतिकोसुदी को आकल्पान्त स्थायिनी बना दिया अदवितवराद के इतिहास मे उनका नाम सदा स्व्णाक्षरो से टिखा जायगा जद्वितवाद की जैसी सेवा उन्दने की है, वैसी शायद ही विरखे ही कृतियो- दारा इई हो मधुसूदन के प्रभाव से प्रमावित होकर अद्वैतवाद प्रनर- तर्‌ से भ्ररङतम दो गया

उनके सन्यासाश्रम के गुरु श्रीविश्वेश्वर सरस्वती थे | उन्न अद्धैतरलरक्षणनामक निबन्ध की परिसमाति भगवान्‌ विश्चेश्वर एवे अपने गुरु का अभेदखूप से निर्देश कर स्वरचित म्रन्थ उनको समर्पित किया है वे छिखते है--

अद तरलमेतन्तु श्रीविक्वेश्वरपादयोः खमर्पितपेतेन प्रीयतां स॒ देयानिधिः॥

प्रकृत सिद्धान्तनिन्दु के प्रारम्भ मे मज्गखाचरण करते हए उन्दा-

ने कहा है--

( 2

श्रीशङ्कर्चार्यनवावतारं किष्वेश्वरः विश्वशुर" प्रणस्य वेदान्दशासरश्रवणालसखानां चोधाय कुव कमपि भवन्धम्‌॥ इससे भी सिद्ध होता है करि उनके गुरु का नाम विश्वेश्वर था। उनके शिक्षागुरु माधव सरखती थे उन्दने चद्वैत-सिद्धि की परिसमाप्ति च्खि है-- श्रौभाधवसरस्वस्यो जयन्ति यमिनां वरः! चयं येषं प्रसादेन -शाखरार्थे परिनिषिताः॥ गूढार्थदीपि्ा-नामक्र -गीता की व्याख्या की समप्ति ममी च्वि है-- श्रीरापविष्वेश्वरपाध्रवानां प्रसखादमासाय मया गुरूणाम्‌ खथाख्यानमेतंड्‌ विहितं खुवोधं सपपितं तद्यरणाम्बुजञेषु -इस्यादि शोको से विदित होता है कि उन्होनि शाखाध्ययन माधव

सरखती के निकट किया था, विशरेश्वर सरखती उनके दीक्षागुरुं थे ओर श्रीरामानन्द खामी उनके परमगुर्‌

उनके प्न्थो के उपक्रम एव उपसंहार देखने से ज्ञात होता है कि इन्होने अपने समी ग्रन्थ संन्यासावस्था मे ही रचे ये।

मधुसूदन सरखतीजी की विप्णुमक्ति अतुरुनीय है | वे जैसे ज्ञानी थे, वैसे ही भक्त भी ये इस प्रकार ज्ञान एवे भक्ति का सामञ्चस्य उन्दीं- देखा गया है उनके सपान शाज्लमीमांसक विरे ही इए है गीता की मूढ्ाथैदीपिका व्याड्या मे सर्वत्र ही उन्ोने विष्णु भगवान्‌ के प्रति

प्रगाढ भक्ति का पस्विय दिया है गीतान्याख्या की समति दिया गया निन्नङ्खित छोक कितना माव्मय है--

चंशीविभूपितकराच्रयनीरदाभात्‌ पीतास्चररद्रुणचिस्वफलाध्रसेषठात्‌ 1 पूर्गन्दुरुन्द ग्मुगवादगचिन्दनेना- त्छष्णात्परं किमपि तन्त्वमर्ह जामे॥ अदत-सिद्धि के प्रारम्भ एवं अवसान मे भी उन्होने निश्नङ्िखित पथो से विष्णु यी अमिवन्दना की है-- माय करर्पितमातृतापुन्रमृषा्ं तप्रपञ्चाययः सत्यगानस्नुर्ात्मक्रः श्रुति रिखोत्थाखण्डध्री गोचरः मिथ्यायस्धचिधूननेन पर्मानन्देकतानात्मको मोक्षं प्राप्त इव खं विजयते विष्णुर्चिकद्पोल्ितः॥ यो र्ष्म्या निखिलानुपेश््य चिदयुधनेको चतः स्वेच्छया यः र्वान्‌ स्मृतमात्र एव सततं सर्यात्मना रक्षति यश्चक्रोण नित्य नक्रमकयोन्परुक्तं महा फुर दपरेणापि ददाति यो निजपदं तस्मै नघः विष्णवे दोनों छोको के भत्र अपू उपरितन शोक अद्धितवाद के भार्वो से सराबोर हि, अधस्तन पुराणो वणित भगवान्‌ की ्रिं्तनी ही मनोहर कथार्ज का स्मरण करता है इतने मे ही उनकी हरिभक्ति- प्रमादता की इतिश्री नदीं होती इसके अनिरिक्त उन्होने हरिभक्ति प्र॒ भक्तिरसायन-नामक एक॒ खतन्त्र अल्युत्तम निबन्ध छ्खिा है उसमे भक्ति को जो स्थान उन्ोनि दिया है, उससे सडसा यह सन्देह होने ट्गता है कि यह किसी वैष्णव आचार्थकी तो कृति नही हे ! ञद्धैत्राद के दर्जनों प्रौढ प्रन्थों के सफ़ल रचयिता की लेखनी से यह्‌ प्रसूत होना कि भक्ति खतन्त्र पुरुपार्थं एवं मुक्ति से भी बदकर्‌ दे, अवद्य आश्च्जनका एवं उनके पूर्ण ॒भक्त एवं उदर हृदय होने का साक्षी है। मधुसूदन सरखतीजी की निष्कामता भी अलोकिक है उन्होने अनेक अन्धो की रचना की पर म्रन्थशर्ैत्व का अभिमान उद छर तक

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नहीं गया वे उनका कत्ता अपने फो समश्चते दी नष्टं ये। सम्य भी तो कैसे £ प्रथम श्रेणी के आत्पज्ञानी के च्यि यह कैसे सम्भव था-। इसी च््यि उन्दने ट्वा है-- भ्रन्थस्यैतस्य यः कन्त स्तूयतां वा निन्यताम्‌ 1. मयि नास्त्येव क्ंत्वमनन्या्ुभवास्मनि जव "तमतति “अहं ब्रह्मस्मि" इत्यादि महावाक्यो के षिचार से अपरोक्ष ज्ञान हो गया--अआत्मसाक्षत्कार हो गया भे बही (अत्मा दी) ह, उससे प्रथक्‌ नदीं रेसी भावना दृढ हो गयी, तव अनात्माश्रित अहंकार-ममकार का पता ही कर्द उन्होने अपने सतव ग्रन्थ मगवान्‌ एवं युरुओं को समर्पित विये है | यत्करोपि यद्रश्चासि यज्ज्ञरौपि ददासि यत्‌) यत्तपस्यसि कौन्तेय ! तत्ङकरुष्व मदर्पणम्‌ इस मगवटुक्ति के अनुपार मन्थ ही नहीं अन्थनिर्माण से उस्पन्न इञा सुकृत भी उन्होने श्रीकृष्ण भगवान्‌ के अर्पण कर दिया | अद्ैत-सिद्धि की परिसमापि मँ वे चिद्ते है-- कुतकगरङाकुङं भिपजितु मनो दुर्धिंयां मयावमुदिततो सुदा चिपघातिमन्नो महान्‌ 1 अनेन सकलापदां विघटनेन यन्प्रेऽभवत्‌ परं खुरूतमपिंतं तदखिकेश्वरे श्रीपतौ गुरु को समपेण करने के वचन अद्ैतरत्रक्षण, गीताग्याख्या आदि मेँ कहे गये हैँ उनका दिग्दर्शन परे हो चुका है मधुसूदन सरस्वतीजी का पाण्डित्य सर्वतोमुख था वे जैसे वेदान्त के प्रमाद पण्डित थे, वैसे ही नव्य न्याय आदि दर्शनो मे भी उनकी अप्रतिहत गति थी पण्डितमण्डी मे देसी किंवदन्ती प्रचक्ति दहै कि सेन्थास रेने के अनन्तर मधुसूदन सरस्वती अपनी जन्मभूमि के दर्शन करने के छिये एक नार पुनः नवद्वीप मँ गये उनके वर्ह जाने से

(६ )

नैयायिक-सिरभोरो जो खल्बटी मची, उसका एक कवि ने अच्छा चित्र खीचा है वह कहता है-- नवद्वीपं समायतते मघुसूद्नवाक्‌पतौ चकम्पे तक्रागीशः करातसोऽभूद गदाधरः

छुना जाता है वह वे अपने सतीर्य गदाधर भट्टाचार्य के अतिधि दए ये | गदाधर भद्वाचाय॑ जव अपने अन्तेवास्सियो को न्यायङ्ञासर पढने रगे तो उन्ोने सोपहास्त कहा--क्या छात्रावस्था मे जो टिपणि्यौँ संकलित की थी, उन्हे दी अप अभीतक्र पदति है? इसी सिर्सिले मे दोनों मे शाख्रचची छिड गयी उस च्चमे गदाधर भट्राचार्यं ने मधुसूदन सरस्वती की अपूर्वं कल्पनाराक्ति तथा असीम पदा्थ-सम्पत्ति को देख कर उन सा्टङ्ग प्रणाम कियाथा। इसी नव्य न्याय की प्रखरता के कारण उन्होने अपने ग्रन्थों में परमत के खण्डन-अवसर पर युक्तयो एवं अनुमान से कम च्या है ज्यौ पर अन्य प्राचीन आचार्यो ने केव श्रुति के सहारे से परमत-खण्डन का प्रयत्न किया दहै, वर्हौ पर वे अभिनव युक्तिर्यो एवं तर्को से उसका खण्डन करे कृती हए अदैतसिद्धि की समाप्ति उन्हनि अपने

अनेक विदार्ओ के पर्विय का स्वयं उदेव किया है--

गुरूणां माहास्स्यान्नि जविविधयियापरि चयात्‌ ्ुतेयन्मे सम्यङ्मननपरिनिष्पन्नममवत्‌ परव्रह्मानन्दस्पफुरणमचिदानथ शमनं तदेतस्मिन्‌ अन्धे निखिलमतियत्नेन निदितम्‌

मधुसूदन सरस्वतीजी के समस्त भ्रन्थो उनकी ददयस्परी ज्ञान- गरिमा, भ्रवछ भक्ति एवं उदार हृदय का पस्विय मिर्ता दै जीबन की साधना के साथ जिन म्रन्थो का प्रणयन होता है, उनके भाव अक्र्य दृदयस्पशां होते है मधुसूदनजी की जीवन की साधना को उनके म्रन्थ अभिन्यक्त करते शिव चौर विष्णु मे उन्हे कोई मेद नही ` भास्तता था, महिश्नःसतो्न की शिवपरक एवे विप्णुपरके व्यार्या उनकी

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अपू कुशरता एवं शाखगाम्भीथै का चोतन करती इदं इस वात को पुष्ट करती है

मधुसूदन सरस्वतीनिर्भित निन्नछिखित १० ग्रन्थ उपरन्ध है-- ८१) तिद्धान्तविन्दु या सिद्धान्ततखब्रिन्ु, (२) वेदान्तकल्पकतिका, (३) संक्षेप शारीरकल्याख्या, (४) अदैतसिद्धि, (५) गूढायंदीपिका ( गीता-न्याख्या ), (६ ) अद्वैतरतरक्षण, (७) प्रसानभेद, (८ ) महिस्नः- स्तोत्र की व्याख्या, (९) मक्तिरसायन एवै ( १०) भागवत -व्यास्या

यच्पि इनकी स्वी हई भागवत की व्याख्या सम्पूणं हमरे दृष्टि- गोचर नहीं हुई, परन्तु बृन्दावन से प्रकाशित श्रीनिव्यस्वखूप त्रह्यचारीजी के बहतसंस्करण मँ प्रथम शछोकमात्र की व्यास्या हमने देखी है उसके आदि मे मंगल करते हए आचार्य टिखते है-- श्रीकृष्णं परमं तसं नत्वा तस्य प्रसादतः श्रीसागवतपद्याना क्रथ्िद्धावः प्रक्रार्यते॥ अनुदिनमिदमायुःसर्वदाऽसत्पसंगे- ्हुचिध्रपरितापैः क्षीयते व्यथमेव 1 हस्चिरितुध्रामिः सिच्यपानं तदैतत्‌ श्णमपि सट स्यादित्ययं मे श्रमोऽच इन शोको से माद्धम होता है कि उन्होने सम्पूरणं भागवत की टीका रची है, पर हमारे दुभौम्य से इस समय बह सम्पूण उपरन्ध नहीं है जमनी के थोडर्‌ (10007) महाद्चय ने अपने बुत्‌ सुचीपत्र (०६०1०६४७ 09न्भब्छण भण) उक्त दस भ्मरन्थो' के अतिरिक्त अत्मवोध-टीकः, अनन्दभन्दाकिनी, . कृष्णकुतङ्क नाटक, `मक्ति- सामान्यनिंरूपण, वेदस्तुति की दीका आदि १२ अर्थो को ओर जोड़ कर उनके २२ म्रन्थो का उदेख किया है | पर सेच्कृत-संसारं में उनके उपथुक्त १० ही भ्रन्य प्रसिद्ध है } उनके ग्रन्थो मे इन प्रथो का कह उछेख भी नद्यं मिला है सम्मव है ये उन्हीं की कतिया हं या किंसी

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अन्य मधुसूदन सरस्वती की अदयावधि इन अतिरिक्त प्रन्थों को देखने कामी हमे सौमाग्य प्रप्त नदं हुआ |

उनके पूर्वोक्त ग्रन्थों में किसकी रचना सरसे पहले इई ओर किसकी सनसे पीछे इस विषय मे क्रमिक निर्देश करना असम्भव है, क्योकि किसी मी ग्रन्थ मे उसके निमीण करी तिथि नही दी गथी केवरु एक यदी सूत्र निर्णायक है किः किस म्रन्थ के वचन किस भ्रन्थमें उद्धृत किये गये हैँ यह देख कर जिक्त ग्रन्थ के वाक्य दूसरे म्रन्थ में उद्धृत हए है, उसे पूर्ररचित एवं जिसमे उद्धृत किये गये है, उसे पश्चातु रचित सिद्ध करना `उक्त युक्ति का अवर्म्बन कर ज्ञात होता है कि उनकी सर्वप्रथम कृति सिद्धान्त-चिन्दु है, कारण क्रि अद्ैतसिद्धि- म--“गुस्पादित चैतदस्मामिः सिद्धान्तविन्दौ" (नि सा० सं० पृ०५७६, (स्वमुपपादितमस्मामिः सिद्धान्तनिन्दौ, ( नि० सा० सं° प° ५५९ ) “सिद्धान्तनिन्दुकल्परुतिकयोविस्तरः' (नि० सा० सं प्र ८६६) इप्यादि वाक्यो मे सिद्धान्त-बिन्दु का समुषेख किया गया है, इसलिये यह सिद्ध होता है किं अद्वैतसिद्धि की अपेक्षा सिद्धान्त-बिन्दु प्राचीन है। मष्िभ्नःस्तोत्र की टीका, वेदान्तकल्पटतिकः, गूढाथंदीपिका, भागवत की व्याख्या, भक्तिरसायन एवं अद्वैतरतरक्षण से भी यह अन्ध प्राचीन है कयोविः महिख्नःस्तोत्र की उ्याख्या मे बेदान्तकल्पर्तिका का उदे है--

ध्विस्तरेण चात्र युक्तयो वेदान्तकल्परतिकायामनुसन्धेयाः यथा खन्दादपरेक्षनिर्धिकल्पकनोधोत्पत्तिस्तथा प्रपञ्चितमस्मािर्वेदान्तकल्प-

कतिकायाम्‌ ( कमशः मदिश्नःस्तोत्र के २६ ओर २७ ये ररोक की व्याख्य। ) वेदान्तकल्पकतिका मे सिद्धान्तचिन्दु का उदेव आया है-- विस्तरेण प्रपञ्चितमस्माभिः सिद्धान्तनिन्दौ बे° क० सरस्वतीमवन सं° पर= ८७ ) अद्वैतसिद्धि मे गीतान्याख्या गूदाधदीपिका का उदेव है--

[3 षु 9 तर

विस्तृतमिदभस्माभि्गीतानिबन्धने (प° ७३९) गीतादीका भागवत [9

की दीका काउट्ेख किया गया है, भागवतदीका भक्तिरसायनकानाम

आया है-- मक्तिरसाञुभवप्रकारश्च सर्वोऽप्यस्माभिः मक्तिरसायने-

(१२) `

अभिहितः (स्क० १अ० इटोक की व्याख्या ) भक्तिरसायन बेदान्त- ` कल्पलतिका का उष्ेख किया है-- विस्तरस्तु अस्मदीयवेदान्तकल्प- उतिकायामनुसन्वेयः सिद्धान्तविन्दु का उठेल वेदान्तकल्परूतिका मे आया है इत्यादि उद्धरणो से सिद्ध दयो गया कि उपयुक्त पुस्तकों से सिद्धान्तविन्दु प्राचीन है यचपि सिद्धान्तविन्दु मे भी वेदान्त कल्परुतिका का उल्छेख है -- "विस्तरस्तु वेदान्तकल्परतिकायामनु- सन्धेयः ( सि वि० प° २११); "विस्तरेणेतत्‌ प्रपच्ितमस्मामि- वैदान्तकल्पर्तिकायामित्युपरम्यते' (सि ° वि प्र २३१) तथापि इसे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि वेदान्तकल्पठ्तिका इससे प्राचीन ह, क्योकि वेदान्तकल्पल्तिका मे भी तो सिद्धान्तविन्दु का उल्छेख है ये दोनों समकालिक भले ही मान किए जार्यै, इसमे हमें विभ्रति- पत्ति नदीं है अद्वैतरल्रक्षण मे बहत स्थलों भै अद्वैतसिद्धि के वचन उद्धत कयि गये है इससे विदित होता है कि उक्त निवन्ध पूर्वोक्त सब प्रन्धों से अनाचीन है यह निर्णय करना कठिन दै किं महिम्नः स्तोत्र की व्याख्या तथा सेक्षेपशारीरक की व्याख्या से अदैतरलरक्षण प्राचीन हैया अवौचीन | तो उनम अद्वैतरत्ररक्षण का उल्टेख मिला है, उनका अदैतरलरक्षण में |

मधुसूदन सरस्वती के समय का अभीतक टीक-टीक निर्णय नहीं हो सका इस विष मे अनेक मतभेद है ! कोई सोरहवीं शताब्दी के अन्ततक ही उनका कार सीमित करते है, तो कोई सतरहवीं राताब्दी के तृतीय भाग मे उनका जन्म निश्चित करते हैँ ठेकिन मेरे विचार मे उनका जन्म सोर्हवीं शताब्दी के चतुथं मागमे इभा था ओर सन्‌ १६५० तक वे वि्यभान ये उनका रचनाकार १६१० से

१६४०. तकत माना जाय तो कोई अपक्ति प्रतीत नदीं होती रेतिह्ासिक छान-बीन के बाद यह बात प्रायः निश्चितो गयी है कि

अप्पय दीक्षित का जन्म सन्‌ १५२० इञ या ओर ५७३ व्षैकी ` अवसथा मे सन्‌ १५९६ वे स्वर्ैवासी इए ये अदैतसिदिमें मधुसूदन सरस्वती ने अप्यय दीक्षित का '"परिमख्कारः पद्‌ से नडे आदरके

( १३ >)

साथ उनल्ठेख किया है | बे ठ्खिनि है- ‹(सर्वनन्त्रस्वतन्तर्भामतीकारकल्प- तरुकारपरिमरूकोरिरिति" मधुसूदन सरस्वती का सर्वतन्त्र स्वतन्त्र कह कर उनकी प्रशंसा करना एवं दार्निकशिरोमणि भामती- कार की समान कक्षा में उनका उदेख करना इस बात को सिद्ध करता है किं अष्पय दीक्षित का जन्म मधुसूदन सरस्वती के जन्भ से कम से कम ६० वर्ष पूर्य हज था एवं मधुसूदन सरस्वती की भ्न्थ- रचना के समय वे ससार मे नहीं रह गये थे

| यदि मधुसूदन सरस्वती का समय मी सोखहवीं राताब्दी के अन्ततकं या इससे कु पूर्वं मान छिया जाय तो इससे बहत-सी अङ चनं उपस्थित होती है-- प्रथम तो यह क्रि मधु्ूदन सरस्वती एवं अप्पय दीक्षित के वय मे बहुन कम अन्तर मानना पड़ेगा एक प्रकार से वे समकाठिक सिद्ध हो जार्थेगे यदि थोडी देरके ल्यि मान भी चया जायकिवे समकाटल्किथे, तो शंका होती दै कि एक अपने समकाछिक का अपने प्रन्थ मे बडे आदर के साथ उद्धव करे ओर दूसरे उनके विषय सर्वथा मोन रहँ यह कैसे सम्भव हो सकता पाण्डित्य के ङिहाज से भी मधुसूदन सरस्वती उनसे कुछ कम नहीं ये उनका म्रन्थ-रचना का कार भी थोडा नहीं रहा उनका म्नन्धप्रणयन मे कम-से-कम २५-३० वर्ष का काल ङ्गना सम्भव है। दोनों विद्वान्‌ काशीवासी ही थे इसय्यि यह नहीं कहा जा सकता दै किं अपने समकाटीन प्रकाण्ड पण्डित की कोई भी कृति उनके दृष्टिगोचर नदय इई होगी, अतः उनका उनके भ्रन्थो मे समुछेख नदीं इञ इत्यादि विवेचन से भी सिद्ध होता है कि मधुसूदनजी की प्रन्थ-ए्चना उनके देहावसान के बाद से आरम्भ इई थी मधुसूदन सरस्वती की सबसे परी कृति सिद्धन्तबिन्दु है यद पहले सिद्ध किया जा चुका है सिद्धान्तविन्दु की एक प्रति उपडङ्ब्ध इई है उसमे लिखे--^नवाभ्निवाणेन्दुमिते शकान्दे वाक्य के अनुसार उसकी भरतिष्पि १५२९ शकान्द अर्थात्‌ सन्‌. १६१७ मे इई थी इससे यह स्पष्टतः सिद्ध होता है कि सिद्धान्तत्रिन्दुः की रचना

१६१७ ते पूर्वं हई थी इसके अवसर सत्रहवीं कत्तव्दी करे तृतीय मान नँ सी उनका जन्म कदापि नदीं मना जा सन्तता कोड्‌ लेग इससे = [त 1 "कद, = को

इससे यक भीतिद्ध कस्ते कि नषटुघुदन सरस्वती का काठ स्न्‌

के पूर पश्चात्‌ नदीं ! दुस्ता असुमान तमी सन्भव हो सक्ता है जच क्ति देसी व्यापि दो किं च्रन्यकत के जीन का उसेक च्न्य की प्रतिच्पि नहींद्यो सक्ती च्किन देसी व्याप्ति नीं देखी जाती ¡ स्म््रति मी देसे ग्रन्थकार विद्मान हैँ

जिनकी छ्िर्यो के कहत वर्प ूर्व ते कित्तने ही संत्करण प्रका्चित हो रें है ओर कितनी ही वार उनकी प्रतिच्पि हयो उुकी हैँ! इसे ची सिद्ध होता है कि श्िद्धन्तचिन्दु की रचना सन्‌ १६१७ से पूवे इई है ¡ चत तरिषव को विस्तार के मवत्त यँ यहीं समाश्च कर देता! जिन

यद्याच्तयों को विदष्र जानने की इच्छ ह्ये उर चणप्‌] ०ई छतलाद्श छ€उ6थ©, ५2025 के ( 01). 17 ८27६ 77 २. ८. 97--104) तथा ८717९888 0६ 2168 2182६ 28 21 10168 8€122:63 के (ष0,. एए ९. ए. 177--189मे देखना चाहिये इय प्न्य करा मापालुवाद गङ्गातीरनिवासी देदान्तचाल् के मर्मह

विद्याच्‌ एक महास्शजी की छपा से सम्प हअ दै उनके अदे से नै उनका नाम प्र्रादित करने मं अकप्तमथद्नं | उक्त महात्माजी कते आदेदा से इतना वरहा पर ओर कड देना चाहता कि इस प्रन्यर्मे जं च्प्यिणी दी नवी है, उक्तको च्लि मे प्रायः महामहोपाष्याय वासुदव न्नाद्ी अन्यङ्कर की चिन्दुभरपक्त्याल्या से मद्दटी गयी दै, इसचि्यिं अरन्यमाखा की ओर चे उने तथा उक्त नहात्माजीको हदय से अनेकानेक धन्यवाद देकर विरान लता ओर्‌ विद्भानो से इसमे इई तुर्वि के चवि क्षमा चाहता द्रं |

६५

जन्पा्सी १६८६ चिनीत

श्रीपरमात्मने नमः

सिद्धान्तबिन्दु फी विषय-सूची!

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चिंषय प्राक्कथन - मूक-र्छोक मङ्घलाचरण अत्मिसेरूप एवं भ्रन्थरचना का प्रयोजन अनात्मा से अतिरिक्तं आत्मा काज्ञान ह्योनेपर भी दुःख

देखा जाता है, अतः आत्मतच्चप्रतिपादन व्यथे है -“““

आत्मतचखप्रतिपादन की सफख्ता आत्मत के प्रमापक

(तत्‌, पद का वाच्य अर्थं

(तत्‌ पद का छ्य अथं

श्वम्‌ पद का वाच्यं अथं

स्वम्‌. पद का रक्ष्य अथं

महावाक्यं मेँ छक्षणाब्ृत्ति का उपपादन

कही अभिघेय अर्थं मे मी विरोषण-विरोष्य की प्रतीति

नदी होती

शाब्द की वृत्ति वक्ता के तात्पयं के. अधीन है

टृषटान्तपूरवैक प्राभाकर के मतं का खण्डन

वाच्यं अर्थो मे परस्पर विरोध होने से रक्षणा की आवद्यकता

महावाक्य मँ पुनरुक्ति नहीं है

ठक्ष्य-अर्भं की अखण्डता

निर्विकल्पक वाक्यार्थं के अनुरूप पदजन्य पदार्थो

पस्िति भी ज्ञान के समान निर्विकल्पक होती है. ˆ रक्षयतावच्छेदक के चिना क्षणा की अलुपपत्ति नहीं है “““"

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विषय वेदान्त-विचार कें व्यथेत कौ अद्रीद्काः- ` ` - विचार की आवद्यकता का निरूपण _. , 6 जीव को खर्प वो विपय मे चावोकं आदि के सत म्रथम इलोक की अवतरणिका नन सूममि-- प्रथम छवः देहात्मबाद आदि का निराकरण काम आदि सन के घमं है ॥, = अन्यान्य दा्सौनिको द्वारा आत्मरूप से माने गये देह सेः लेकर केवर सोक्तापयंन्त सत अनात्मा है देहादि की अनात्मता यं हेतु अत्मा के ष्वंसामाव एवं ब्रागभाव नहे हैँ आत्मा का अत्यन्ताभाव भी न्यं है आत्मा का अन्योऽन्याभाव मी नहीं है चैनो के मत मे आत्मा के अव्यन्तामाव का सम्भव ~. वैदोषिक आदि के मत में आत्मा के अन्योऽन्याभाव का सम्भव ---- सुषुप्ति मे वोध होने से आतमा अग्यभिचरित नहीं है--रेसी आडाङ्का --- सुषप्तिमे भीव्रोधदहैही अरोप में संस्कार हेतु है करि वत्तु की तथ्यता प्रमातृचैतन्यं आदि के खूप का निख्पण ` ~~ प्रमाता साक्षी नहीं है +. कूटस्य आत्मा ही साक्ती है अन्तःकरण प्रमा का आश्रय है, आत्मा नदीं ---- नीरूप का भी प्रतिविम्ब हो सकता है 1 इन्दि्यो से अग्राञ्च का मी प्रतिचिम्त ह्येता आकादा साक्षिमाव्य है, नेत्रग्रा्च नहीं है ` ` --~-

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, विष्य आत्मा कै प्रतितिम्ब होने

प्रतिबिम्बवादी के मत मे प्रतितरिम्ब की सत्यता

1

ब्रमाण

आभासवादी के मत मेँ प्रतिनिम्न की असत्यता

मन के प्रमाता होने की पुष्ट

अध्यास की अनुपपत्ति में

आत्मा अध्यास का अधिष्ठान नह है अनात्मा अध्यास के अधिष्ठान नदीं है

पूवेपक्ष

अनात्मा के भिध्यात्व मे श्रुतिप्रमाण

अध्यास मे आत्माश्रय आदि दोर्षो का उद्भावन समी पदार्थो के अध्यासमूकक होने पर भ्रम, प्रमा आदि

व्यवस्था की असुपपत्ति क्षँ मनुष्य रेसी प्रतीति स्मृतिदहैन प्रमा

आत्मा में मनुष्यत्व, करच॑त्व, भोक्त॒त आदि धम नही

है, इसमे श्रति-प्रमाण

आत्मा मे मनुष्यत्व, कतेत्व, भोक्तत्व आदि धमं ` नहीं

है, इसमे युक्ति-प्रमाण

- विनादी देह आदि आत्मा नहीं हैँ

ज्ञान देह का धर्म नहीं है ज्ञान नित्य है ज्ञानं एक है

$ निर्धर्म आत्मा खप्रकारारूप, आनन्दरूपं एवं निधंमेक है

भे मनुष्य यह प्रतीति

श्रमदहै

उक्त श्रम का कारण अज्ञान है

. अज्ञान अनिर्वचनीय दै

अज्ञान ज्ञानामावरूप नहीं है

अज्ञान श्रमपरम्परारूपः

संशयपरम्परारूप न्रमसंस्कार-

प्र

-.* ४१ ¢ चिति के प्रतिबिम्ब की चेतन एवं अचेतन से विरक्षणता ` *

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दिषय

रूप एवं सं्यसंस्काररूप भी नदीं है आत्मा भ्रम का उपादान-कारण नहीं है अज्ञान मावरूप है इसमे प्रमाण अज्ञानाध्यास अनादि है . क्रमराः अहङ्कार आदि का अध्यास होता हैः -अन्योन्याध्यास्ं का निख्यण

कार्याध्यास संस्कार से होते हैँ अध्यास का रक्षण

जीव, ईश्वर आदि की व्यवस्था “तत्‌”, त्वम्‌, आदि पदोमिं जह क्षणा

द्ध चैतन्य के जभासर काही वन्धहै ` 1 "तठ" (वम्‌, आदि पदो जहदजहछ्क्णा =

आसासवाद का खर्प

प्रतितिम्बवाद्‌ का खरूप

विवरणक्ार तथा संक्षेपशणरीरककार मँ मतभेद अवच्छेदवाद्‌ का खर्प

म्रत्येक जीव का प्रपच्छ प्रथक्‌ टै

सिद्धान्त मँ ङरखखूप तथा जीवखसरूप - एकजीववाद्‌ दृष्ि-सष्ठिवादं

एकजीववाद मे दो ग्रकार

परस्परविरुद्ध वात्तिककार आदि के मर्तो मे व्रामाण्यका

उपपादन

सिद्ध वस्तु मे भी विकल्प हो सकता है

देत के प्रत्यक्ष से अद्धैतके वाध की शङ्का प्रमाण प्रमेय आदि प्रतिकम्म॑-्यवयथा

जज्ञानं कौ आवरणरूप एवं विक्षेपरूप दो सक्ति --. प्रमाण, प्रमेय आदि व्यवस्था शर मे नद्ध, किन्तु जीवे है

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[ * 1.

चिपय

ठोकिका ज्ञान की प्रतरिया

प्रमात्‌-चैतन्य तथा प्रमाण-चैतन्य का निरूपण

प्रमिति-चैतन्य

म्रमेय-चैतन्य

अन्तःकरण के तीन माग

प्रमातृ-चैतन्य के सम्बन्ध के ल्यि एवं विषयगत आवरण को हटाने कै स्यि अन्तःकरण की इत्ति होती है

चृत्ति के निना अन्तःकरण-सम्बद्र धर्म, अधर्मं आदि का भी भान नहीं होता

ब्रह्म का भी आवरण होता है

वृत्ति से आवरण नष्ट नही, किन्तु अभिभूत ह्येता है -“““

ब्रह्मज्ञान से ही आवरण का नारा होता है

वृत्ति से आवरण का ना होता है यह पक्षान्तर

अनुमान आदि से आवरण निचृत्त होता है या नदीं शङ्का

आवरण दो प्रकार का है--असखापादक तथा अभानापादक

ग्रथम की प्रमाणङ्ञानमान्र से निवृत्ति

द्वितीय कौ प्रत्यक्ष से द्यी निदृत्ति

असत्वापादक आवरण प्रमात्‌-चैतन्य मेँ रहता है

अभानापादक आवरण प्रमेय-चैतन्यमे रहता है

अनिर्वचनीय ख्याति का खीकार करने पर भी कतरेत्व आदि धर्मो की दो प्रकार से प्रतीति नहीं होती ˆ"

दितीय शोक की अवतरणिका

प्रमाता, प्रमाण आदि न्यवहार के मिथ्या होने से वेद मे अप्रामाण्य-राङ्का

(न वणीः'--दहितीय छो

प्रमाता, प्रमेय आदि व्यवहार कौ ज्ञान के अनन्तर मिथ्याचप्रतीति होती है

परण ९४ ९५५ ९५ ९५ ९.६,

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-.. विष्य वर्ण्‌, आश्रम, धारणा, ष्यान आदि का खरूप . . ध्व माता---तीसरा मातृत्व, पितृत आदि देह्ासिमान मूक है खुषुि मे पितृत्व आदि के अभाव मे श्रुतिप्रमाण सुषुप्ति मे शून्यता का अभाव सुषटुि मे जीव कौ अद्धितीयत्रह्मरूपता चतुर्थं छोक की अवतरणिका

जीव-्ह्म की एकता असम्भव है-रेसी शङ्का,

उसका समाधान

भगवान्‌ के छः गुण ओपनिषद मत "न सांख्यम्‌--चतु्धं छोक ` सौख्य के प्रधानकारणवाद का खण्डन पाञ्युपत आदि के मर्तो का खण्डन मीमांसक के मत का खण्डन मीमांसक के मत में वेदान्तवाक्यो की विधिहोषता ` ( विच्यङ्खता ) अथेवाद्‌ के अधिकरण का तात्पयं वेदान्तवाक्य खतः सफर होने से अन्य के अङ्खं नदीं हैँ कम-विधिर्यो ही परम्परा-सम्बन्ध से वेदान्त- वाक्यो की अङ्गै नैयायिक आदि के मत का खण्डन भेद-अभेदनाद का खण्डन क्षणिक्वाद्‌ का खण्डन निष्कषं-कयन

` ११७ ` ११८. ˆ ११९ (न -.* १२१ -&& < 4.

-.- १२३ जगत्‌ के कारण आदि कै विषय सांख्य आदि कै मत ` "१२५ ` १२७ “श्यद्‌ ` १२८ ` १३१ ` १२१

१२४

(६. : 1878. #

` १३४

(9२9... ` १३४ ˆ १३५ ` १३५. “` १३६

[ ] चिचय

पञ्चम शोक की अवतरणिका

ब्रह्म के विभुत्व की असम्भावना की शङ्का ओर उसका समाधान

“न चोर््वम्‌--पश्चम शोकं

ब्रह्म ` की विञ्ुता का उपपादन

जीव को अणु कहना ओपचारिक है

षष्ठ श्टोक की अवतरणिका

"न डुशम्‌--श्रष्ठ श्टोक

परमात्मा सच अनर्था से रहित है

सप्तम शलेक की अवतरणिका

ब्रह्मभाव के उपदेश की असम्भावना की शङ्का

रास्ता--सप्तम इरोक

ब्रह्मभाव के उपदेश का फल

अष्टम इटोक की अवतरणिका

जाग्रदवस्था की अनुपपत्ति की शङ्का

“न जाग्रत्‌ः--अष्टम इरोक

वेदान्त-मत मे पदार्थं का निरूपण

दक्-दद्य-मेद से पदाथं दो प्रकार के है द्क्‌-पदाथं आत्मा है

ईशर, जीव एवं साक्षी-मेद से आत्मा तीन प्रकार का है ˆ १४५९ 4 जि ५९4 ` १५१

मतभेद से साक्षी कै खरूप का निरूपण

, वार्सिंककार के मत मे आत्मा का विध्य

चिष्णु ब्रह्म एवं रुद्ररूप से ईशर के तीन भेद हिरण्यगमं ओर ब्रह्म मे भेदः

एक ही परमात्मा के विष्णु, ब्रह्म आदि अवतार हँ विश्व, तैजस एवं प्राज्ञ-मेद से जीव तीन प्रकार काहे

साक्षी एकदै

प्र

` १३६

ˆ“ १२३६ ˆ १३८ ` १२८ ` १३८ ^ ९२९ - १४० ` १४७१ ` १४२ ` १४४ १४४ ˆ १४६ ` १४६ १४८ ` १४८ ` १४८

` १४९

१४९

१५९१ १५२ १५३

विष्य

य-पदार्थ-निरूपणं

पुव १५४

अव्याकृत, मूर्तं एवं अमृर्त-मेद से दद्य पदार्थो मं त्रैविष्य १५५

अव्याकृत का खस्य अन्याकृत का क्तायं अन्धकार का खख्प दिक्त्‌ तथा काट की अम्रामाणिकत्ता अन्तःकरण का खूप ग्राण-खरूप इन्द्रियो की उत्पत्ति पौव की तेज से उत्पत्ति ` इन्द्रियो के अधिष्ठाता देव नेत्र तथा श्रोत्र विषय-देदा मे जाते हैँ हिरण्यगर्भं रान्द का अर्थं सूत्र शव्द का अधं पञ्चीकरण की प्रक्रिया त्रिदरत्करण त्रिदृत्करण क्रा खण्डन त्रिदृत्करण श्रुति का तात्पयं रारीर, उसके सेद ओर खषि्रम म्रख्य का क्रम म्रतिदिन द्येनेवाला प्रख्य ्ाकृत प्रख्य आत्यन्तिक म्रख्य प्रपच्छ मायिक हने पर भी तुच्छ नहीं जाग्रदवश्चा का खरूपु

जाग्रदवस्था से विख नामक जीव भोक्ता है -

सन्नचश्ा क्रा ख्य

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५.2

विपय

खाप्रिक पदाथं अविद्याजन्य है "““" १७६ अर्थीष्यास तथा ज्ञानाध्यास काउपादान अधिधा हीहै १७७ खाध्यास कँ अधिष्ठान का विचारं 2" १८० खपाध्यास "का अधिष्ठान जीव-चैतन्य है इत्यादि पक्षः" १८० अधिष्ठान की आचृतता का उपपादन "ˆ" १८२ अन्तःकरण तीन प्रकार से उपाधि दै ९. जाग्रदवस्था के ज्ञान से खप्रावस्था के ज्ञान कौ निदृत्ति असम्भव है--यह शङ्का - , १८५, जाग्रदवखा ज्ञान से खप्नवसा के ज्ञान की निचृत्तिका उपपादन १८६ अज्ञान नानाह ° "(८९ मूलाज्ञान से अवच्छिन ब्रह्मचैतन्य खपाध्यास का अधिष्ठान है--इस दूसरे पक्ष का उपपादन ˆ“ १९१ मनोवच्छिन ब्रह्मचैतन्य खपराध्यास का अधिष्ठान है-- इस तीसरे पक्ष का उपपादन स. इदः रजतम्‌” यँ पर्‌ इदः प्रातीतिक है ९२ इदः रजतम्‌" ययँ पर शुक्ति कै इदमस्य का भान होता है १९३ खप्रमे तैजस नामक जीव भोक्ता है ""“ १९३ सुषु्ति-अवस्था का खरूप “**“ १९६. सुषुप्ति अवि की तीन दृ्तियोँ होती है ˆ“ १९६ सुषुप्ति मे अहङ्कार के अभाव का प्रतिपादन 9८ स्मरण आदि साक्षिचैतन्य के अशितैः . `“ २०० अनुमानादि-श्रम मे मी अवियादृ्ति टी है ` “` २०९ नाम आदिमे जो ब्रह्माध्यास उसमे मनोवृत्ति श्रम एवं प्रमा से विलक्षण है -.“` २०९ तकं भी मनोदृक्तिरूप है `“ २०९ टग्‌ ओर दृश्य का अन्वय-व्यतिरेक ` ` -" २१० ` साक्षी ओर साक्ष्य का अन्वय-व्यतिरेक ` . ` २९०

१४

१९१ १४

११

१८

२१

१९

9

विषय

आगमापायी भौर उसके अवधिरूप का अन्वय-व्यतिरेको

दुःखी ओर परमंप्रेमास्पद का अन्वय-न्यतिरेक अनुकृत ओर व्याब्त्त का अन्वय-व्यतिरेक उक्त चार तर्को का चार्‌ अध्यायो से सम्बन्ध सुति मेँ प्राज्ञ नामक जीव भोक्ता है

सुषु मेँ श्वर के अभेदोक्ति की उपपत्ति संस्कार साक्षिखरूप के अन्तरगत नहीं है . मरमाठृ-मेद

अन्ततः साक्षी तथा प्रमाता का एष्य

सपति मे दुःख नहीं है

अध्यात्म आदि का खरूप देक्य की उपासना से हिरण्यगमंलोकप्राप्ति क्रममुक्ति सयो सूक्ति नवम इरोक की अवतरणिका साक्षी के असत्यत्व की राङ्का “अपि व्यापकत्वात््‌ः--नवम इखोक साक्षी सत्य है जहो परिच्छिन्त्व है, वयँ तुच्छत्व है ` मोक्ष मे पुरूषा्थ॑ता का उपपाटन लोकिक सुख मेँ अनित्यता का उपपादन मोक्ष दुःखामावरूप होने पर भी पुरुषार्थं है मोक्ष मे सुख-संबेदन का विचार आत्मा खप्रकाशा, ज्ञान एवं आनन्दरूप है भै जानता इस प्रतीति को उपपत्ति दशम इरोक की अवतरणिका

... २११ 3 ` २०५. ˆ ९२५

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जाग्रदादि प्रवयेक अवद्थाओं का जाग्रदादि-भेद से त्रैविध्य

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( ११ |

विषय

जगतसत्यत्ववादी का आक्षेप

(नन चैकम्‌-- ददाम शलोकं

जगत्‌ की असस्यता तथा ब्रह्म की सत्यता में -श्रुति-प्रमाण

अभाव-ज्ञान मे प्रतियोगी ज्ञान की कारणता

आत्मा वागगोचर है

आत्मा श्रुतिसिद् है

्न्थसमापि मे पूरवाचार्यो को प्रणाम, ग्न्थमृहिमा, खाहङ्कारपरिहार, ग्रन्थरचना का हेतु

श्रति आदि कौ अेक्रमणिका

इति

षु पण ` २३९ ` २२९ ` >३२९ १८ ` २४२९ ` ४२ ॥. ˆ ९९५ ` २४७

1

-ॐ श्रीपरमात्मने नमः भ्रीमच्छङ्राचायविरविररै दश्छोकी ` ---*=अ&ी<->--- ` भूमिने तोयं तेजो वायु- खं नेन्द्रियं वा तेषां समूहः अनेकान्तिकत्वात्सुषुप्त्येकसि- सतदेकोऽवदिष्टः रिवः केवोऽहस्‌ वणी वणीश्रसाचारधमं मे धारणाध्यानयोगाद्योऽपि | अनात्माश्रयाहममाध्यासहानात्‌ | तदेकोऽवरिष्टः शिवः केवरोऽहम्‌ २॥ मातापितिवानदेवान रोका नवेदा यज्ञा तीं त्रुबन्ति सुषुप्तौ निरस्तातिशून्यात्मकत्वात्‌ तदेको ऽवशिष्टः शिवः केवरोऽहस्‌ ३॥ साङ्ख्यं दौवं तत्पाञ्चरात्नं जैनं न. मीमांसकादेमैतं वा। विशिष्टाचुभलया विशुद्धात्सकत्वात्‌ तदेको ऽवशिष्ट; रिवः केवो ऽहम्‌ चोर्ध्वं चाधो चान्तनं बाह्यं ` मध्यंन तियङ््‌ पूवापरा दक्‌

$

वियद्न्यापकत्वादखण्डेकरूप-

स्तदेकरोऽवशिएटः शिवः केवलोऽहम शुखं = छष्णं रक्तं पीतं

कुञ्जं पीनं हस्वं दीधम्‌

अरूप तथा ज्यातिराकारकलत्‌ .

तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवरोऽहम्‌ रास्ता रासं शिष्यो रिक्षा

नचत्वंन चाहं चायं परप्छः। स्वरूपावबोधो विकस्पासदिष्णु-

स्तदेकोऽबश्ि्टः शिवः केवलो ऽहम्‌ जाग्रन्न मे स्ञ्चको वा सुषुप्ति-

विश्चोन वा तैजसः भाज्ञको वा | अविदयात्मकत्वाल्रयाणां वुरीय-

स्तदेको ऽवरिष्ट; शिवः केवरोऽहस्‌ अपि ज्यापकत्वाद्धितत्वप्रयोगात्‌

सखतस्सिष्टमावादनन्याश्रयघ्वातच्‌ जगत्तुच्छमेतत्समस्तं तदन्यत्‌ |

तदेकोऽवदिष्टः रिवः केवरोऽहस्‌ 1 चैकं तद्न्यद्‌ द्वितीयं ऊुतरस्याद्‌

वा केवरत्वं चाकेवरूत्वस्‌ ! शुन्यं चाशुन्यसद्धेतकत्वात्‌

कथं सवेवेदान्तसिदं वीमि ॥१०॥

~" स्र्ध्-व्ञ-------~ ~

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किद्धान्तबिन्दुः

[ भाषालुवादयुतः!

श्रीगणेशाय नमः श्रीसरस्वत्ये नमः | श्रीगुरुभ्यो नमः

श्रीशाङ्कराचायनवावतारं विश्वेश्वरं विश्वगुरुं प्रणम्य | वेदान्तश्षा्श्रवणाटसानां बोधाय क्वे कमपि भवबन्धम्‌ श्रीशङ्कराचार्यखूप से नूतन अवतार स्यि इए जगदूगुरु श्रीविश्वेश्वर को प्रणाम कर विद्याल वेदान्त-राश्लि को सुनने मे आलस्य करनेधाठे रोगों के वोध कै चिम एक विरुक्षण ग्रन्थ की सचना करता ह्रं |

9 उपनिपत्‌ उप- समीप मेँ याये हुए प्रत्यगास्मपरायण पुरुषो के मूला्लान- सहित संसार को सादयति--नष्ट कर देती है, दस्ति उपनिषत्‌ ब्द का चर्थ-- “ह्मविध्या' है

उस व्ह्यविद्या की शिक्ता देनेवाले उपनिषत्‌-विद्या के भाष्यादिके श्रवण से यलस पुरूषो को संप से बोध कराने के जिए

सब. सिद्धान्तो का संमहरूप अपू अन्थ

सिद्धान्तदिन्दुः

इह खट सा्ात्‌ परम्परया वा सर्वानेव जीवान्‌ सयुदिधी- षुभेगवानाचा्यः श्रीशङ््योऽनात्मम्यो विवेकेनात्मानं निचययद्ध- इुटयुरस्वभवं संक्षेयेण योधयितुं दश्छोकीं मणिनघ्य

यौ पर साक्षात्‌ अथवा पर्या से समस्त प्राणिर्यो का उद्धर! करने की इच्छावाङे भगवान्‌ श्रीख्ङ्कसचायं ने जनाताओं से विवेकूर्चः निर्य, रसद, सुद ओर सुक्तस्वमाव आत्मा का संक्षेप से वोध कराने के डद दद्लश्छोकी की रचना की !

नन्बिद्ञारास्पदेस्योऽनात्मस्यो निवेकेनाऽ्दङ्लरास्पद सात्मानं

सर्योऽपि रोकोऽदसस्मीति प्रयेति दुःखं चालुभवति तेन ज्ञात- ्ापकत्वान्निष््रयोजनत्वाच्ात्सतच्वपरतिपादनं व्यर्थमिति चेद्‌ न॑! विद्धास्यस्वेन रुक्षणेनेर्दकारास्पदानामपि देदेन्द्रियमनसां मरतिभासवोऽह्ङ्कारास्पदत्वेन तद विवेकात्‌ !

चर्ये ` है" देसी प्रतीति के विष्य अनाना (देह, इन्दिय, मनः प्राण) से विवेकेपूचक *अहम् इस प्रतीति के विय ओं को

सह साधन द्वितीय ्नात्सतरन का विचार अस्तुत होने पर उन्तमाधिकारी को दश््छोच्छी के वसमान से 1 ~ अन्य पुरूषो को दशग्छोकी के उपदे छे ऋनल्तर श्रदण-मननादि